हिन्दू दर्शन परम्परा

हिन्दू धर्म में दर्शन की प्राचीन परम्परा है । वैदिक दर्शनों में छः दर्शन अधिक प्रसिद्ध और प्राचीन हैं। गीता का कर्मवाद इनके समकालीन है

न्याय-दर्शन:- महर्शि गौतम द्वारा रचित दर्शन में पदार्थों के तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का वर्णन है। पदार्थों के तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान की निवृत्ति होती है। इसके अलावा इसमें न्याय करना तथा जय-पराजय के कारण स्पष्ट है।

वैशेशिक दर्शन:- महर्शि कणाद रचित दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का वर्णनहै। मानव कल्याण हेतु धर्म का आचरण है।इसके अनुसार चार पैर होने से गाय- भैंस एक नहीं हो सकते।

सांख्य दर्शन:- इस के रचयिता महर्शि कपिल हैं। इसका प्रमुख सिद्धांत शुभ कारणों से शुभ कार्यो की उत्पत्ति होती है। प्रकृति से पुरूश रचना और संहार के क्रम को विशेश रूप से मानता है। पुरूश प्रकृति का भोक्ता है, जबकि प्रकृति स्वयं भोक्ती नहीं है।

योग दर्शन:- इस दर्शन के रचयिता महर्शि पंतजलि हैं। इसमें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का वर्णन है। परमात्मा का ध्यान आंतरिक होता है। परमात्मा के मुख्य नाम “ॐ” का जाप न करके अन्य नामों से परमात्मा की स्तुति और उपासना अपूर्ण है।

मीमांसा दर्शन:- मीमांसा दर्शन मानव के पारिवारिक जीवन से राष्टंीय जीवन के कर्तव्यों का वर्णन करता है, सम्पूर्ण कर्मकाण्ड के मंत्र विनियोग पर आधारित है। धर्म के लिए महर्शि जैमिनि ने वेद को परम प्रमाण माना है।

वेदांत दर्शन:- वेदों का अतिंम सिद्धांत है। कर्ता-धर्ता व संहार कर्ता होने से जगत का निमित कारण है। वेदांत दर्शन के अनुसार ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, आनंदमय, नित्य, अनादि, अनंतादि गुण विशिष्ट शाश्वत सत्ता है। जन्म-मरण आदि क्लेशों से रहित और निराकार है। परन्तु जीवात्मा हमेशा से ही अपने दुखों से मुक्ति का उपाय करती है।