सूर्य ग्रहण

अमावस्या को सूर्य एवं पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा आ जाने से सूर्य ग्रहण होता है। जिस अमावस्या को सूर्य तथा चन्द्रमा के अंश, कला, विकला समान हो उसी अमावस्या को सूर्य ग्रहण होता है। ऋग्वेद के 5/ 40/5-9 मन्त्रों तक सूर्य ग्रहण का चमत्कारिक वर्णन है। महार्शि अत्रि ने इन्ही मन्त्रों को तपस्या के बल पर ग्रहण के अद्भुत रहस्य को सर्वप्रथम सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया अतःमहर्शि अत्रि ग्रहण के प्रथम आविष्कारक हैं।

भास्कराचार्य ने सूर्य सिद्धान्त में सूर्य ग्रहण का विवेचन किया है। आधुनिक वैज्ञानिक भी इसे प्रमाणिक मानते है।

पूर्ण सूर्य ग्रहणः- चन्द्रमा के अंश जब राहु या केतु के अंशों के समान हो और पृथ्वी उन अंशों के समान हो या पृथ्वी उन अंशों के बिल्कुल समीप हो तो पूर्ण सूर्य ग्रहण होता है। इस ग्रहण के समय राहु और केतु सूर्य के समीप ही रहते है अर्थात् सूर्य पर राहु वा केतु की पूर्ण छाया पडती है। इस परिस्थिति में चन्द्रमा की गहरी छाया पृथ्वी के जिन-जिन स्थानों पर पड़ती है उन्हीं स्थानों पर पूर्ण सूर्य ग्रहण होता है।

अर्ध सूर्य ग्रहणः- चन्द्रमा के अंश जब राहु वा केतु के अंशों के समान हों, परन्तु चन्द्रमा पृथ्वी से दूर हो तो अर्ध सूर्य ग्रहण होगा।

आंशिंक सूर्य ग्रहणः- चन्द्रमा के अंश जब राहु वा केतु के अंशों के समान ना होकर उन अंशों के समीप हो तो आशिंक सूर्य ग्रहण होता है।

सूर्य ग्रहण का समयः- पूर्ण सूर्य ग्रहण लगभग 2 घण्टे तक रहता है परन्तु पूरा सूर्यमण्डल 10 से 12 मिन्टों तक गाढ़ा काला हो जाता है। उस समय रात्रि जैसा दृश्य हो जाता है। सूर्य के पूरी तरह ढकने से पहले पृथ्वी का रंग बदलता है। इस विशेश परिस्थिति में पशु-पक्षियोंमेंभी भय का संचार होता है। यह दिव्य दृश्य वैज्ञानिकों एवं ज्योतिशियों तथा धर्म शास्त्रियों के लिए उपयोगी होता है।

पूर्ण ग्रहण लगभग 18 वर्श 11 दिन के बाद पुनः आता है। वर्श में अधिक से अधिक 7 ग्रहण और कम से कम 2 ही ग्रहण हो सकते है।

सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण से 12 घण्टे पहले लग जाता है।अतः कुशा का प्रयोग सूतक से पहले करें।

ग्रहण में क्या ना करेंः- ग्रहण काल में भोजन करना, जल पीना, शयन करना, मूर्ति स्पर्श करना, वृक्ष काटना, फूल तोड़ना, वस्त्र धोना, वस्त्र सिलाई करना, फल सब्जी काटना मना है तथा ग्रहण को नंगी आंखों से नहीं देखें।

ग्रहण में क्या करना चाहिएः- ग्रहणकालमेंजप,हवन,संकीर्तन, तीर्थ स्नान आदि का विशेश महत्व है। ग्रहण समाप्त होने पर स्नान करके दान, देवपूजा, श्राद्ध आदि करें। पूर्ण सूर्य ग्रहण के स्नान का फल कुरूक्षेत्र एवं पुष्कर में होता है। इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण नदियां, सरोवर, तालाब, तीर्थ स्थानों आदि में भी स्नान का विशेश महत्व है।

कुशा का महत्वः- ग्रहण काल में राहु वा केतु के कारण भू मण्डल तथा वायुमण्डल पर सूक्ष्म एवं अति सूक्ष्म असंख्य कीटाणु तथा विशाणु वातावरण को अशुद्ध कर देते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से कुशा सौर ऊर्जा की सुचालक है। ग्रहण काल में उत्पन्न होने वाली असंख्य अशुद्ध तरंगों को अपने में विलीन कर लेती है। कुशा के महत्व को पं. मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में ग्रहण के समय विद्यार्थियों को प्रयोग करके दिखाया था। उन्होने दो थाल लड्डूओं के रखे। एक थाल में कुशा रखी और दूसरे में नहीं रखी। ग्रहण के बाद जब सूक्ष्मदर्शी (टेलीस्कोप) से देखा तो जिसमें कुशा रखी थी उसमें कोई भी विषाणु नहीं था और जिसमें कुशा नहीं रखी थी उसमें असंख्य विषाणुओं को देखा गया।

मुक्तावली के अनुसारः- वारितक्रारनालादितिलदभैर्नदुष्याति। कुशा तथा तुलसी पते खाने और पीने की वस्तुओं में डालने से कुप्रभाव दूर होता है।
महाभाष्यकार पतांजलि ने “वृद्धिरादैच” इस सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखा हैः- प्रमाणभूतो आचार्योदर्भ पवित्रपाणिः सूत्राणि प्रणयतिस्म । इस सूत्र का एक भी शब्द अनर्थक नहीं हो सकता है। इससे कुशा की दिव्यता एवं पवित्रता की महता का पता चलता है।

विशेष:- गर्भवती स्त्रियों के लिए। ढीले वस्त्र पहने अर्थात् वस्त्र कसे हुए ना हो, कैंची या चाकू का प्रयाोग ना करें, वस्त्रों की सिलाई आदि ना करें, कुशा के आसन पर बैठें।

दानः- ग्रहण के बाद जन्म राशि,जन्म नक्षत्र,जन्म लग्न और अनिष्ट ग्रहों को शांत करने के लिए दान आदि करें।