सूतक (जन्म – अशौच) एक अवलोकन

जननाशौच – जन्म से उत्पन्न अशौच। शौच का अर्थ शुद्धि, अशौच का अर्थ अशुद्धि, वेदबोधित- कर्मार्हता शुद्धि – वेदों में बताए गए कार्यों को करने की पात्रता को शुद्धि कहा है। शौच का अर्थ शुद्धि व शुचि है। ऋग्वेद में शुद्ध शब्द 13 बार व शुचि शब्द 6 बार आया है। अशौच का अर्थ ‘‘ अघ ’’ है और ‘‘अघ’’ का अर्थ ‘‘ पाप ’’ है। (ऋग्वेद 1/97/1-8, 10/117/6) वेदों में व अन्य शास्त्रों नें शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया है। शुचेर्भावः कर्म वा शौचम्। न शौचं इति अशौचम्।।(32/8)।। जन्म के कारण अशुद्धि वह है जो किसी अपने निकट परिवार व ‘‘गौत्र’’ में जन्म के अवसर पर होती है। ऐतरेय ब्राह्मण शास्त्र में ‘‘ सूतक ’’ शब्द परिभाषा में कहा है कि जो सूतक से प्रभावित घर में भोजन करता है उसे घोर प्रायश्चित करना पडता है। जन्म के समय की अशुद्धि – सूतकेे कर्मणां त्यागः होमः श्रौतस्तु कर्तव्यः शुष्कान्नेनापि वा फलैः।।(मनु 5/58)।। सूतक लगने के बाद देवकार्य व पितृकर्म आदि धार्मिक कार्य नहीं हो सकते।

जन्म के बाद सूतक क्योंः- माता के गर्भ में जब नवजात शिशु होता है तो वह अपने प्राणमय कोश, ब्रह्म स्थान, नाभिचक्र जिसमें 72000 सूक्ष्म व अतिसूक्ष्म नाड़ियाँ होती हैं उनके माध्यम से खान-पान, श्वास-प्रश्वास लेता है और बढता है। जन्म के बाद जब नाल काटा जाता है तो इस ब्रह्म स्थान को काटने से तथा अन्य रक्तपात के कारण जो घोर ब्रह्मदोष लगता है उसको सूतक कहा जाता है। सूतक का दोष नाल काटने के बाद ही लगता है। यह जन्म के बाद की अशुद्धि है।

प्रथम तीन पीढियों के लिए शुद्धि विचार:-

ब्राह्मण- 10 रात्रियों के बाद 11वें दिन शुद्ध होता है।

क्षत्रिय –12 रात्रियों के बाद 13वें दिन शुद्ध होता है।

वैश्य –15 रात्रियों के बाद 16 वें दिन शुद्ध होता है।

षूद्र –30 रात्रियों के बाद 31वें दिन शुद्ध होता है।

व्यवहारिक पक्ष – जैसे चोट लगने पर श्वेत रक्त कण घाव को ठीक करते हैं उसी तरह जब परिवार में नवजात उत्पन्न होता है तो कुलवृद्धि की खुशी होनेपर ‘‘ डोपामिन ’’ (मैडीकल साइंस) रसायन शरीर में बढ़ जाता है अर्थात् हमारे मनोभाव तरंगों में असीमित वृद्धि हो जाती है। उनको सामान्य होने में लगभग 10 -25 दिन का समय लगता है। दूसरी ओर नवजात शिशु और माता की देखभाल में सब लग जाते हैं। इसलिए ऋषियों ने व्यवहारिक रूप से सूतक व्यवस्था रखी है।

सूतक में क्या ना करेंः- मूर्ति स्पर्श,मन्दिर जाना,पूजा-पाठ करना, धार्मिक यात्रा, मेला – उत्सव, यज्ञ, किसी प्रकार का दान ना लें ना दें, रजस्वला स्त्री सूतक वाले कमरे में ना जाएं।

सूतक के बाद आंतरिक शुद्धिकरण:- पंचगव्य प्राशन करें, गंगाजल पीएं, तुलसी पत्ता ग्रहण करें, कम से कम 100 बार प्राणायाम करें।

ब्राह्मशुद्धि:- पंचगव्य स्नान, तीर्थस्थानों की मिट्टी एवं जल से स्नान, कुशा से स्नान, घर एवं देवस्थान में पंचगव्य व गंगाजल से छीटें दे। हवन द्वारा आंतरिक शुद्धि एवं ब्राह्मशुद्धि तथा घर की शुद्धि करें।