सनातन धर्म में श्राद्ध-कर्म (पितृ यज्ञ)

श्राद्ध की परिभाशा:- श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम् , श्रद्धया विधिनाक्रियते यत्कर्मतत्श्राद्धम्।

अर्थात् पितरों के उद्देश्य से जो श्रद्धा पूवर्क किया जाने वाला कर्म श्राद्ध है। श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक है। मृत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धा युक्त होकर तर्पण, पिण्ड, भोजन दानादि किया जाता है उसे श्राद्ध कहते है। भारतीय श्राद्ध विज्ञान के उदात्त चिन्तन में “आब्रह्मस्तभ पर्यन्तं ये ब्रह्मण्डोदर वर्तिनः” कहकर अनन्त ब्रह्मण्ड में भ्रमित जीवात्माओं की तुष्टि के लिए मानवीय कर्तव्य के पालन के लिए प्रत्येक सनातन धर्म वाले को श्राद्ध कर्म करने का शास्त्रीय नियमहै।ऋग्वेदमेंपितृकर्मकावर्णन10/191/2-4 तथा7/38/8 है।

श्राद्ध का महत्वः- जिन माता- पिता आदि ने हमारे सुख-सौभाग्य की वृद्धि के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न किए, कष्ट सहे उनके इस पितृ ऋण से निवृत होने के लिए श्रद्धा भक्ति पूर्वक श्राद्ध करना आवश्यक है। शास्त्रानुसार ऐसा व्यक्ति जिसने मृतक की विरासत में पाई है और उससे प्रेम और आदर भाव रखता है। उस व्यक्ति का श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करना अनिवार्य है। श्राद्ध कर्म अपने परिवार के पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है।

पुत्र शब्द का अर्थ ही है:- पुम् नाम नरकाद्यस्यात् पितरं त्रायते सुतः।
तस्मात् पुत्र इति प्रोता इह यापि परत्र च। (ग.पु. 21/32)

पुम् नामक नरक से जो पिता आदि की रक्षा करता है। इसी कारण उसे पुत्र कहा है।

श्राद्ध करने का अधिकारीः- संयुक्त परिवार हो तो ज्येष्ठ(बड़ा) पुत्र। ज्येब्ठ पुत्र की अनुपस्थिति में अन्य पुत्र व पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकता है। यदि परिवार अलग-अलग हो तो सभी अलग-अलग श्राद्ध करें।

श्राद्ध का समयः- वर्श के किसी भी मास, पक्ष, तिथि में स्वर्गवासी पितरों के लिए पितृपक्ष (श्राद्धपक्ष) कीउसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। “पितृ पक्ष” भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू अश्विन मास की अमावस्या तक 16 दिन पितृ पर्व हैं।

याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसारः- याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार यदि मृतक की तिथि ज्ञात हो उसी तिथि को श्राद्ध करें। जिस व्यक्ति की मृत्यु तिथि का ज्ञान ना हो उसका श्राद्ध अमावस्या को करें।

मितक्षरा के अनुसारः- मितक्षरा के अनुसार पितरों के कल्याण के लिए श्रद्धापूर्वक वस्तु व द्रव्य को देना श्राद्ध है।

ब्रह्म पुराण के अनुसारः- ब्रह्म पुराण के अनुसार वार्षिक तिथि वाले दिन श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को जो दान दिया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।

कल्पतरू के अनुसारः- कल्पतरू के अनुसार इस पितृ यज्ञ में पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मणों को भोजन आदि देना और ब्राह्मणों द्वारा ग्रहण करना श्राद्ध कर्म है।

सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्म जी ने पितरों की तुष्टि-पुष्टि के लिए श्राद्ध कर्मो का निर्माण किया था। इस लिए जब कामनायें पूर्ण होती है, तो पितर अपने वंशजों को सुख शान्ति का आशीर्वाद देते हैं। वर्तमान में देखा गया है कि परिवारों में सुख-शान्ति कम हो रही है। इसका श्राद्ध आदि न करना भी एक कारण है।

पितर अपने कर्मो के अनुसार स्वर्गलोक, यमलोक, पितृलोक और देवलोकऋृग्वेद3/58/5,7/76/2 से सूक्ष्म शरीर वायु रूप में श्राद्ध के निमित पृथ्वी लोक पर आते हैं।

श्राद्ध का समयः- ब्रह्म जी ने दोपहर का समय श्राद्ध करने के लिए अति उत्तम कहा है।

ब्राह्मण निमन्त्रणः- बौधायन स्मृति सूत्र में श्राद्ध से एक दिन पहले श्रद्धापूर्वक सुपात्र ब्राह्मण को निमन्त्रण देना अनिवार्य है। श्राद्ध में उस ब्राह्मण को बुलाना चाहिए जो ब्राह्मण के लक्षणों को पूरा करता हो।श्राद्ध में ‘‘गौ’’ माता को चारा,भोजन दें। मनु3/132-146

किस-किस का श्राद्ध कर सकते हैंः- श्राद्ध पिता पक्ष अर्थात् पिता-माता, दादा-दादी, नाना-नानी, सौतेली माता, पत्नी, पुत्र, पुत्री, चाचा-चाची, ताया-ताई, मामा-मामी, भाई, मौसी, फूफी, बहिन, भतीजा, दामाद, भांजा, सास-ससुर, आचार्य, गुरू, मित्र, शिष्य ,नौकर अन्य कोई निकट सम्बन्धी हो उसका भी श्राद्ध कर सकते हैं।

निर्णयसिन्धु के अनुसार – जो व्यक्ति धनहीन और पत्नीहीन हो वह श्राद्ध वाले दिन वीरान जंगल में जाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दोनों हाथ उठाकर देव स्वरूपी पितरों का ध्यान करके कहे कि मैं धनहीन हूँ, पत्नीहीन हूँ मैं श्राद्ध नही ं कर सकता। मुझपर दया करें। फिर दिन-रात का उपवास करें। यह नियम केवल धनहीन, पत्नीहीन वालों के लिए है।

श्राद्ध कर्मः- मृतक प्राणी की नारायण बलि, सपिण्डीकरण श्राद्ध के बाद उसकी पितृ संज्ञा हो जाती है। उसके बाद ही श्राद्ध करना चाहिए।
पितर सात पीढ़ियों तक है। इनमें तीन अमूर्त पितृवंश और चार मूर्त पितृ वंश है।

श्राद्ध के मुख्य अंगः- विश्वेदेव पूजन, पितृ पूजन, तर्पण (जलांजली), अग्नि में आहुतियां, जल में आहुतियां

प्ंाचबलि:- गौ बलि, श्वान (कुत्तो) बलि, कौए बलि, देव बलि, चींटियों के लिए बलि।

श्राद्ध के समय नारायण स्मरण या विष्णु सूक्त या पितृ सूक्त का पाठ करें साथ में पितृ- गायत्री स्मरण करें- देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमःस्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः।।

श्राद्ध में देवपूजन तथा तर्पण के साथ ब्रह्म यज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ एवं मनुष्य यज्ञ करें। भोजन के बाद ब्राह्मण को तिलक लगाकर यथाशक्ति वस्त्र, दक्षिणा, फल आदि देकर प्रसन्नता से विदा करें।

श्राद्ध करने का फलः-
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्ग ं कीर्ति ं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृ पूजनात्।।
आयुः प्रजां धनं वि स्वर्गं मोक्षं सुखानि च।
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः।।

पितरों का श्राद्ध करने से आयु, संतान, यश-कीर्ति, स्वर्ग, सुख-शान्ति, सौभाग्य पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु और धन.धान्य की प्राप्ति होती है।

पितरों को कैसे मिलता है श्राद्ध का भोजन:- जैसे किसी व्यक्ति के बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने पर उस व्यक्ति के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर होकर उस व्यक्ति को मिल जाते हैं । उसी प्रकार जिन- जिन पितरों के नाम पर श्राद्ध का भोजन दिया जाता है वह भोजन उन-उन पितरों को ही मिल जाता है।

विसर्जनः- पितृ विसर्जनी अमावस्या के दिन सांयकाल दक्षिण की ओर मुख करके पीपल के नीचे तेल का दीपक जलाकर विधिपूर्वक पितरों का विसर्जन करें। अतः पितृ पक्ष में श्रद्धा से श्राद्ध करने से पितृगण वर्श भर प्रसन्न रहते है।