संक्रान्ति । पूर्णमासी । अमावस्या

संक्रान्ति:- श्री सूर्य नारायण भगवान का एक राशि से दूसरी राशि में जाना संक्रान्ति कहलाता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसारः- रवेः संक्रमणं राशो संक्रान्ति इति कथ्यते। ऋग्वेद में सूर्य नारायण के 12 नाम हैं, 12 राशियां हैं, एक वर्श में 12 संक्रान्तियां होती हैं। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक का समय सौरमास कहलाता है। सौरमास सूर्यनारायण को समर्पित है। वैशाख संक्रान्ति को सूर्य भगवान मेश राशि में आते हैं और मकर संक्रान्ति को सूर्य भगवान मकर राशि अर्थात् उतरायण में आते हैं। इसलिए वैशाखी और मकर संक्रान्ति ही ऐसे त्यौहार हैं, जिन्हें सूर्यमास अर्थात् संक्रान्ति के अनुसार मनाते हैं। शेश लगभग सभी त्यौहार चन्द्रमास 1⁄4पूर्णमासी1⁄2 के अनुसार मनाएं जाते हैं।

संक्रान्ति का महत्व – संक्रान्तो यानि दतनी हव्यकव्यानि दातृभिः। तानि नित्यं ददात्यर्कः पुनर्जन्मनि जन्मनि।।

जो मनुश्य संक्रान्ति वाले दिन मन्दिरों में, देवताओं व पितरों,ब्रह्मणों, दीन-हीनों, गौ माता के लिए दान देते हैं। सूर्य नारायण उस दान पुण्य का फल 12 हजार गुणा देते हैं। इस दिन मन्दिरों में संक्रान्ति सुनने की परंपरा है। ताकि सूर्य नारायण की विशेश कृपा बनी रहे। सूर्य मास (सौर मास) इस दिन शुरू होता है।

पूर्णमासी:- चन्द्रमा की तिथि पूर्णमासी है। मास पूर्णत्व विवक्षया ‘‘पौर्णमासी’’ शब्दः प्रयुज्यते । इस तिथि में मास पूर्ण होने पर पूर्णमासी कहा है। एक पूर्णमासी से दूसरी पूर्णमासी तक का समय चन्द्रमास है।

पूर्णमासी का समय – पूर्णमासी का समय व महत्व साँय काल और रात्रि को होता है। क्योंकि चन्द्रमा का उदय साँय या रा़ित्र को होता है। जब अमावास्या के बाद चन्द्रमा की कलाएं धीरे-2 बढ़नी शुरू होती हैं और 15 दिन बाद जब चन्द्रमा पूर्ण कलाओं से युक्त हो जाता है। इस रात्रि को चन्द्रमा की शीतल किरणें अधिक मात्रा में आती हैं। औशधियां, वनस्पतियां, रात्रि को ही अंकुरित होती हैं और बढ़ती हैं, उसी तरह जीव-जन्तुओं के अंग भी रात्रि को ही बढ़ते हैं।

महत्व – इस दिन लोग सुख-साधनों को प्राप्त करने तथा कश्टों को दूर करने के लिए व्रत रखते हैं, दान करते हैं, श्री सत्य नारायण भगवान की पूजा एवं कथा करते हैं। शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेश महत्व है। इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से विशेश प्रकार के रस का प्रवाह होता है। जो कई प्रकार के रोगों को दूर करता है, वातावरण को शुद्ध करता है।

अमावस्या:- अमा सह चन्द्रार्कौ वसतो यत्र तिथौ सा अमावास्या। अमा=सूर्य की रश्मियाँ, वसु=चन्द्रमा की कलाओं का निवास दिन। चन्द्रमा के शुक्ल पक्ष और कृश्ण पक्ष दो पक्ष हैं। कृश्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं प्रतिदिन कम होना शुरू करती हैं, लगभग 15 दिनों में लुप्त हो जाती हैं। इस दिन सूर्य भगवान की किरणें और चन्द्रमा की किरणें इकठ्ठी हो जाती हैं। चन्द्रमा सोलह कलाओं के साथ अमावस्या की रात्रि में प्रवेश करता है और प्रातः उदय होता है। सूर्या-चन्द्रमसोर्यः परः सन्निकर्शः इति सूर्येन्दु संगमः।। सूर्य एवं चन्द्रमा अमावस्या को एक-दूसरे का दर्शन करते हैं। सूर्य और चन्द्रमा का यह संगम दृश्य अद्भुत होता है।

विशेष महत्व :- इस दिन विशेश दान, ग्रहों की पूजा, तीर्थ स्नान, तथा पितरों की तृप्ति के लिए यह विशेश दिन है। सोमावती अमावस्या, मंगलवासरी अमावस्या, शनिवासरी अमावस्या आदि सभी अमावस्याएं पापकर्म निवृति  के लिए उत्तम हैं।