शिखा (चोटी)

भारतीय सनातन वैदिक संस्कृति में शिखा का महत्वपूर्ण स्थान है। सनातन हिन्दु धर्म का प्रतीक शिखा है। जैसे किसी देश का राष्टं ध्वज उस राश्टं का प्रतीक होता है। उस ध्वज का सम्मान या अपमान उस राश्टं का सम्मान-अपमान है। उसी प्रकार शिखा हिन्दु धर्म का सम्मान-अपमान है। शिखा की रक्षा के लिए हिन्दुओं ने असंख्य बलिदान दिए। छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह, वीर हकीकत राय आदि ने यज्ञोपवीत की रक्षा की। इसके साथ जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने यज्ञोपवीत एवं शिखा की रक्षा के लिए दीवारों में हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहूति दे दी, परन्तु यज्ञोपवीत और शिखा को नहीं छोड़ा था। बुद्धि चक्र के ऊपर सहस्रदल कमल में अमृतरूपी ब्रह्म का स्थान है। इसे जितना हम सुरक्षित, सुसंस्कारित एवं विकास करेंगे, उतना ही आत्मा को शुद्ध रख सकेंगे और भूत, भविश्य, वर्तमान की सत्य घटनाओं का अनुभव होगा। ऋशि-महर्शि तथा योगियों में जो दिव्य दृश्टि रहती है। उसका रहस्य शिखा में विद्यामान है। सूर्यमार्ग से ब्रह्म प्राप्ति कराने वाली योग शिखा है। जो ब्रह्म का साक्षात्कार कराने में साधनभूत है। देवकार्य, पितृकार्य, मंत्र, जप, ध्यान, पूजा-पाठ में शिखा को बांध कर व स्पर्श करके कार्य करें। कम्बल, कुशा का आसन तथा शिखा ये अर्थिंग (मैडिकल सांइस) का कार्य करते हैं।

पारस्कर गृंह सूत्र के अनुसार:-
केशानां शेश करणं शिखास्थापनं। केश शेश करणम् इति मंगल हेतोः।। इस मंत्र में शिखा के मंगलकारी होने का वर्णन है।सुशुम्ना केन्द्र की रक्षा के लिए ऋशि-मुनियों की खोज एक विलक्षण मंगलकारी चमत्कार है।

शारीरिक विज्ञान के अनुसार शिखा वाले स्थान को पिनल ज्वाईंट (मैडिकल सांइस) कहा जाता है। इसके नीचे पिचुटंी (मैडिकल सांइस) ग्रन्थि होती है। जिससे एक विशेश प्रकार का रस निकलता है जो सम्पूर्ण शरीर को बलशााली बनाता है। यह मस्तिश्क का केन्द्र है जो मन, बुद्धि को नियंत्रण करने का स्थान है।शिखा रखने से सहसार चक्र को जागृत करने और शरीर, मन, बुद्धि पर ्नियंत्रण करने में सहायता मिलती है। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार सहसार चक्र का आकार गाय के बछड़े के खुर के समान है। इसलिए ् चोटी को खुर के आकार के बराबर रखा जाता है।

दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे शिखायै:- अतः बल, आयु, तेज एवं बुद्धि की वृद्धि के लिए शिखा धारण करना आवश्यक है। शिखा  शक्तिस्वरूपिणी महामाया है। इस में बल और बुद्धि वृद्धि की कामना की गई हैः-
चिद्रुपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते। तिश्ठ देवी शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुश्व मे।।

‘‘अग्नि’’ को संस्कृत में ‘‘शिखी’’ कहते हैं। इसलिए शिखा वाले स्थान को अग्नि रूपी तेज कहा है।

क्लयजुर्वेदमेंः- तयामामद्यमेधयाऽग्नेमेधाविनं-इसमें शिखा स्थान में ‘‘मेधा’’ शक्तिवान होने की प्रार्थना की है। अन्तरिक्ष में व्याप्त परमात्मा की शक्ति को शिखा अपनी ओर आकर्शित करती है। इसलिए साधना में लीन साधक का सीधा सम्पर्क परमात्मा से जुड़ता है। इसी स्थान को प्रकाश चक्र व दशम द्वार कहा है।

शिखा के लाभ:- शिखा सूर्य किरणों से तेज प्रकाश की शक्ति को आकर्शित करके सहस्रदल चक्र तक पहुंचाती है। जिससे बल, बुद्धि, आयु, आखों की रोशनी, सद्बुद्धि, शुद्धता, सद्विचार,सदविर्ती मे वृद्धि होती है। आत्मशक्ति प्रबल होती है। मनुश्य सात्विक, धार्मिक, संयमी बनता है। प्राणायाम, अश्टांगयोग आदि यौगिक क्रियाओं को सुचारु रूप से करने में सहायता मिलती है।