यज्ञोपवीत (जनेऊ)

संस्कार हीनं न पुनन्ति वेदाः अर्थात्संस्काररहितव्यक्तिकोवेद मन्त्र भी पवित्र नहीं कर सकते हैं।

यज्ञोपवीत – यज्ञ और उपवीत इसका अर्थ है, यज्ञ से पवित्र किया गया ब्रह्मसूत्र या यज्ञसूत्र है। कन्धे से कमर तक धारण किया जाता है। हृदय से स्पर्श करता है। हृदय में ईश्वर का साक्षात्कार करवाता है। मूत्रविसर्जन और शौच के समय दाएं कान पर लपेटें या हृदय से ऊपर रखें। स्मृति प्रकाश में जनेऊ को ब्रह्मसूत्र कहा है:-

 तत्सूत्रमुपवीतत्वाद् ब्रह्मसूत्रमिति स्मृतम्।।

यज्ञोपवीत का महत्व:- यज्ञोपवीत की उत्पति प्रलय के पश्चात् जब पुनः सृश्टि का प्रारम्भ हुआ था। उस समय श्री ब्रह्मजी स्वयं यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे ।

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्।
आयुश्यमग्रयं प्रतिमुंच शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तुतेजः।।

यज्ञोपवीत परम पवित्र है। प्रजापति ब्रह्म ने इसका निर्माण सृष्टि रचना के समय किया था। यह दीर्घायु, सद्विचार, बल, बुद्धि और तेज प्रदान करने वाला है।

ऋग्वेद के अनुसार –पवित्र यज्ञोपवीत धारण से जीवन अनुशासन युक्त व सदाचारी बनता है।

पद्मपुराण के अनुसार – यज्ञोपवीत धारण करने से व्यक्ति के अनेक दुःख दूर होते हैं।

यज्ञोपवीत का प्रमाण:- यज्ञोपवीत 96 अंगुल का ब्रह्मसूत्र है। कर्मकाण्ड के 80 हजार मन्त्र, उपासना काण्ड के 12 हजार और ज्ञान काण्ड के 4 हजार मन्त्र इस प्रकार इन मन्त्रों की कुल संख्या 96 हजार है।

दूसरी ओर तिथि 15, वार 7, नक्षत्र 27, तत्व 25, वेद 4, गुण 3, काल 3, मास 12 इस प्रकार 96 अंगुल का ब्रह्मसूत्र धारण करें। गायत्री मन्त्र के 24 अक्षर हैं। चार वेदों में ‘‘गायत्री’’ छन्द है, जिसके 4अक्षरहैं।24*4=96अक्षर।

सामुद्रिक शास्त्र में मानव शरीर 84 से 108 अंगुल है। जिसका मध्यमान 96 है। जिससे यज्ञोपवीत का मान 96 अंगुल है।

यज्ञोपवीत में नौ देवताओं का वास:- यज्ञोपवीत में नौ सूक्ष्म सूत्र होते हैं। इन नौ सूत्रों में नौ देवताओं का वास है।

ॐ ,अग्नि, नाग, चन्द्रमा, पितृदेवता, प्रजापति, वायु, यम, विश्वेदेव।
ब्रह्मग्रन्थी में ब्रह्म, विश्णु, रुद्र का वास होता है। बिना यज्ञोपवीत धारण के कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जा सकता है।

तीन कर्तव्यों का बोध:- यज्ञोपवीत देव, ऋशि एवं पितृ ऋण अर्थात् समर्पण, निश्ठा, कर्तव्य पालन का प्रतीक है।

विशेष:- यज्ञोपवीत सभी हिन्दुओं को धारण करना चाहिए। इसकी रक्षा के लिए हिन्दुओं ने असंख्य बलिदान दिए हैं। छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह, वीर हकीकत राय आदि ने यज्ञोपवीत की रक्षा की। इसके साथ जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने यज्ञोपवीत की रक्षा के लिए दीवारों में हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहूति दे दी, परन्तु यज्ञोपवीत और शिखा को नहीं छोड़ा था।

किसको कितने यज्ञोपवीत:-ब्रह्मचारी एक, विवाहित दो यज्ञोपवीत धारण करें। एक यज्ञोपवीत अपना दूसरा धर्मपत्नी का, प्रति तीन महीनें से चार महीनें के बीच व जन्मसूतक और मरण पातक तथा ग्रहण के बाद जनेऊ अवश्य बदलें।

यज्ञोपवीत सूत्र का प्रतीक:- जैसे पृथ्वी सूर्य परिक्रमा से यज्ञोपवीत की तरह क्रान्तिवृत रेखा बनाती है, उसी तरह मनुश्य के शरीर पर जनेऊ रेखा का प्रतीक है, जिसका स्वरूप सूर्यनारायण है। अतः यज्ञोपवीत धारी सूर्यनारायण को समर्पित त्रिकाल संध्या उपासना करें।