महामृत्युंजय मन्त्र

मृत्युंजयति इति मृत्युंजय:- जो मृत्यु को जीत ले, उसे मृत्युंजय कहा जाता है। भगवान शिव के आशीर्वाद से महामृत्युंजय मन्त्र द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है।

एक बार माँ भगवती ने भगवान शंकर से कहा कि देवों के देव महादेव मुझे मृत्यु से रक्षा करने वाला तथा सब प्रकार से अशुभों का नाश करने वाला मन्त्र बताएं। तब भगवान शिवशंकर ने महामृत्युंजय मन्त्र बताया।

विशेष:- इस महामन्त्र का जैसा संकल्प करेंगे, उसी संकल्प के अनुसार फल प्राप्त होगा।
 मन्त्र:- ॐ हौं जूँ सः, ॐ भूर्भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
     उर्व्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूँ हौं ॐ ।।

शिवपुराण के सतीखण्ड में इस मन्त्र को सर्वोत्तम महामन्त्र की संज्ञा से विभूषित किया है। मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के कारण इस महामन्त्र को मृत्युंजय कहा है। भगवान शिव के इसी महामृत्युंजय मन्त्र से मुक्ति मिलती है।

जब आप

अचानक कोई नया जटिल रोग होने से।
बीमारी के कारण मृत्युतुल्य कष्ट होने से।
अकाल मृत्यु के भय से।
अचानक घोर संकट में घिर जाने से।
राजदंड, कलह, क्लेश होने से।
बुद्धि की अस्थिरता से।
षनि की ढै ̧या साढ़ेसाती के प्रभाव से।
प्रिय मित्रों के वियोग से।
पारिवारिक सम्बन्ध विवाद से।
व्यापार में होने वाले नुक्सान से।
धन-संपत्ति के विवाद से।
चरित्र कलंकित हो जाने से।
दुर्भाग्य के पीछा ना छोड़ने से।
विवाह में बाधा होने से।

सन्तान प्राप्ति बाधा होने से, मारकेश ग्रहों की दशा, अंतर्दशा के दुष्प्रभावों से, घर में सुख शान्ति के लिए, नाड़ी दोष शान्ति के लिए परेशान हों तो इस महामन्त्र से न केवल मृत्यु तुल्य कष्टों पर विजय पाई जा सकती है परन्तु सभी प्रकार के कष्टों से भी मुक्ति मिलती है।

शिवपुराण और स्कंदपुराण के अनुसार भगवान महामृत्युंजय के जप एवं ध्यान से महर्षि मार्कण्डेय जी तथा राजा श्वेत आदि को मृत्यु के भय से मुक्ति मिली थी। ब्रह्म वैवर्त पुराण में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अंगिरा की पत्नी को मृत्युंजय ज्ञान प्रदान का वर्णन है। देवर्षि शुक्राचार्य ने इस महामन्त्र का दधीचि को उपदेश दिया था, जो मृतसंजीवनी महामृत्युंजय मन्त्र के नाम से जाना जाता है।