पातक (मरण-अशौच) का अभिप्राय

पातक:- मृत्यु के पश्चात् से किरया-कर्म के दिन तक का समय पातक होता है। इस पंचभौतिक शरीर से प्राण सहित जीवात्मा के निकलने के बाद आवश्यक कार्याें को न करना, मरण से लेकर अग्नि संस्कार – अस्थि संचय – अस्थि विसर्जन, किरया-कर्म तक कर्मों का लोप व हिंसा से लगने वाला दोष भी पातक कहलाता है। पातक का एक अर्थ पाप भी है। ऋग्वेद में ‘‘पातक’’ पर हृदय स्पर्शी भावनाएं हैं। ऋग्वेद (1/23/22, 5/12/12) में पातक शब्द का अर्थ ‘‘अंहस्’’ ‘‘ऋत’’ और ‘‘दुऋत’’ रूपी पाप है।

 

भारतीय संस्कार विज्ञान की सूक्ष्म दृष्टि के अनुसार:- ‘‘मृतेऽपि न न जहाति सा वायु धनंजयः।’’ मृत्यु के पश्चात् भी ब्रह्म रन्ध्र सहस्रार , शून्यचक्र, सत्यलोक, ईश्वर का द्वार जो असंख्य किरणों व सब शक्तियों का केन्द्र है जहाँ पर ब्रह्म अपनी महाशक्ति में विद्यमान रहते है। वहाँ ‘‘धनंजय’’ (भगवान का नाम) नामक वायु रहती है। कपाल क्रिया (कपाल मोचन) के पश्चात् ही धनंजय अपनी महाशक्ति के साथ वायु रूप में बाहर निकलते हैं, इसलिए कपाल क्रिया न करना महापातक दोष है।

 

आपस्तम्बधर्मसूत्र में पातक तीन प्रकार का है। (1) पतनीय (2) उपपातक (3) अशुचिकर। मृत्यु स्थान और श्मशान स्थान पर अशुचिता की वृद्धि होती है और कीटाणु तथा विषाणुओं का संक्रमण बढ़ जाता है। इसलिए श्मशान से बाहर आकर स्नान करना जरूरी है। जब तक शव घर, गली, मुहल्ले या गांव में हो, तब तक घर, गली, मुहल्ला व गांव अशौच (अशुद्ध) अवस्था में होता है। मृतक को ले जाने के बाद ही स्नान करके, भोजन बनायें व ग्रहण करें। ऋषियों ने शरीर शुद्धि, ब्राह्मशुद्धि, और द्रव्य शुद्धि पर सूक्ष्मता से बल दिया है।

 

व्यवहारिक पक्ष:- जब किसी की मृत्यु होती है तो सुनने या देखने वाले का मन बहुत दुःखी एवं उदास होता है इस कारण ‘‘एण्डोर्फिन’’ (मैडीकल सांइस) नामक रसायन का स्तर शरीर में उच्चतम अवस्था तक पहुुंच जाता है। जब परिवार में मरण होता है, तो उससे अभिभूत होकर मनोभाव की तरंगो में उच्चतम स्तर की वृद्धि होती है, जिससे हमें अति दुःख की अनुभूति होती है। अपने निकटतम सम्बन्धी के जाने से हम शोकाकुल हो जाते हैं। ऐसे में हमारा मनोभाव शोकयुक्त होने पर मन सामान्य नहीं रहता। इस दुःख के उच्चतम स्तर से निकलने में किरया-कर्म तक का समय लगता है। यह पातक का व्यवहारिक पक्ष है।

 

पातक में क्या ना करें:- पातक तक घर में देवताओं की पूजा अन्य गोत्र वालों से करवाएं। अपने गोत्र वालों से न करवाएं, घरवाले सभी अलग-अलग शयन करें। पूजा के स्थान पर पर्दा डालकर बन्द रखें, ज्योति न जलाएं, तुलसी को जल न दें। इसके अतिरिक्त उतने दिन मूर्ति स्पर्श, मन्दिर जाना, पूजा-पाठ करना, दूसरों का भोजन करना, चरण स्पर्श, व्रत करना, हवन करना, वेदाध्ययन करना, धार्मिक यात्रा, मेला – उत्सव, यज्ञ करना वर्जित है। किसी प्रकार का दान ना लें व साधु सन्तों व भिखारियों को दान न दें। परिवार से अतिरिक्त नवविवाहिता, गर्भवती, रजस्वला स्त्री मरणघर व श्मशान में ना जायें। भूमि पर सोना, एक समय नमक रहित भोजन करें, लहसुन, प्याज का घर में प्रयोग ना करें। मृतक के लिए प्रतिदिन जलांजलि दें। शरीर पर सावुन आदि न लगाएं,तेल न लगाएं, किसी के पैर न छुएं, किसी को आशिर्वाद न दें।

पातक शुद्धि के लिए क्या करें:- पातक के बाद पंचगव्य स्नान, तीर्थस्थानों की मिट्टी एवं जल से स्नान, कुशा से स्नान, घर एवं देवस्थान पर पंचगव्य व गंगाजल से छीटें दे। हवन द्वारा आंतरिक शुद्धि एवं ब्राह्मशुद्धि तथा घर की शुद्धि करें, पंचगव्य व गंगाजल पीयें, मधुपर्क प्राशन करें, कालीमिर्च, नीम के पते चबाएं, अग्निस्पर्श करें।