नवधा भक्ति

 

सनातन वैदिक आर्य हिन्दु सिद्धान्त प्राचीन शास्त्रों में भक्ति मार्ग पर चलने के लिए नौ प्रकार की भक्ति कर उल्लेख है।

‘‘श्रवणं कीर्तनं विष्णोः, स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं, सख्यमात्मनिवेदनम्।।’’

एक से पाँच तक स्थूल उपासना है। इसमें मन लगाना पड़ता है। छः से नौ तक सूक्ष्म उपासना है। इसमें चंचल मन को एकाग्र करके साधना करनी पड़ती है।

1. श्रवण:- ईश्वर की दिव्य महिमा को श्रद्धा से मन लगाकर सुनना। इससें हृदय में भक्ति जाग्रित होती है।
2. कीर्तन:- ईश्वर के गुणों की कथा चरित्र, नाम महिमा, ईश्वर के पराक्रम का आनन्द एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
3. स्मरण:- ईश्वर महिमा और शक्तिका शुद्ध मन व हृदय से स्मरण करना।
4. पद सेवन:- ईश्वर के श्री चरणों का ध्यान करके उनकी मानसिक सेवा करना।
5. अर्चन:- मन, वाणी एवं कर्मों से तथा सर्वोत्तम पवित्र पूजा सामग्री से ईश्वर के चरणों की पूजा करना।
6. वन्दन:- ईश्वर के दिव्य स्वरूप का ईश्वर के परम भक्तों, माता-पिता, ब्राह्मण, गुरुजनों का पवित्र भाव से आदर सत्कार व उनकी सेवा करना।
7. दास्य:- ईश्वर को स्वामी तथा अपने आप को ईश्वर के चरणों का दास समझकर श्रद्धा से सेवा करना।
8. सख्य:- यदि इस संसार में कोई किसी का श्रेष्ठ मित्र है तो वह केवल ईश्वर ही है। शुद्ध हृदय से सब कुछ ईश्वर को समर्पित करना।

9. आत्मनिवेदन:- भक्ति की सर्वोत्तम अवस्था आत्मनिवेदन है। अपने आप को ईश्वर के चरणों में समर्पण कर देना तथा प्रार्थना करना:-

‘‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेवः।।’’

इस प्रकार जो नौ प्रकार की भक्तियों से पूर्ण होते हैं, वे ईश्वर के स्वरूप का दर्शन करते हैं।