दीपक जलाना और सिर मुण्डवाने का महत्व

अन्तिम संस्कार के बाद घर में अखण्ड दीपक जलाना अनिवार्य है। यह दीपक जीव को महायात्रा पथ में अन्धकार निवारण के लिए जलाया जाता है।

प्रार्थना- अन्धकारे महाघोरे रविर्यत्र न दृश्यते। तत्रोपकरणार्थाय दीपोऽयं दीयते मया।।

अखण्ड दीप जलाने की विधि- मृतक आत्मा के लिए मृत्यु स्थान में कनक या धान पर मिट्टी के दीपक का मुख दक्षिण की ओर मुख करके यम मार्ग के घोर अन्धकार को दूर करने के लिए दस दिन तक मिट्टी के दीये में तिल के तेल या सरसों के तेल का दीपक सुरक्षित स्थान पर जलाएं।

यथार्थ पक्ष- घर में जब जीव से आत्मा चली जाती है। तो शव में से दूशित कीटाणु उत्पन्न होते हैं। उन कीटाणुओं को नश्ट करने के लिए नौ रात्रि तक दीपक जलाया जाता है।

दसवें दिन सुबह जल में प्रवाहित किया जाता है। दसवें दिन का पिण्डदान करने के बाद फिर किरया करवाते हैं। दसवें दिन किरया करवाने वाला व्यक्ति वस्त्र त्याग करके नए वस्त्र धारण करता है।

क्षौर क्रिया (मुण्डन) का अभिप्राय- मृतक के पुत्रों द्वारा क्षौरकर्म (मुण्डन) करवाया जाता है। कर्म करने वाला सर्व प्रथम अपना क्षौर (सिर मुण्डन) करवाता है, स्नान करता और यज्ञोपवीत धारण करता है। बाद में शव को स्नान करवाते हैं। क्योंकि यातनापथ पर एक ‘‘शुचिमुख’’ नामक जन्तु रहते हैं। जिनका मुख सुई की तरह तीखा होता है। वे इन सिर के वालों से तृप्त होते हैं। यदि उन जीवों को खाने के लिए सिर के वाल नहीं मिलते तो वे यातनापथ पर गए जीव को सुई की तरह चुभते रहते हैं।
कहीं-कहीं दसवें दिन सभी सम्बन्धीगण क्षौरकर्म अर्थात् सिर मुण्डवाते हैं ।