तिलाञजलि का महत्व

कपालक्रिया व चिता की प्रदक्षिणा तथा तिनका तोड़ने के बाद आए हुए सभी लोग सरोवर व अन्य जल युक्त स्थान पर जाकर गो-गोबर से हाथ धोकर, वस्त्रों सहित स्नान करके, मृतक प्राणी का ध्यान करते हुए, तिलों के साथ जल-अंजली देने को तिलांजलि कहते हैं।

तिलांजलि कब और कैसे देते हैंः- तिल और जल की अजंलियाँ दक्षिण कीओरमुखकरके अपसव्यहोकरदायेंहाथकेअंगूठे कीतरफ (पितृतीर्थ) से चिता दहन से उत्पन्न ताप आदि की शान्ति के लिए 1- 3 -10 या इससे अधिक बार भूमि पर या पत्थर पर तिलांजलि दें। प्रेत को तिलांजलि इस प्रकार कहकर देनी चाहिए-

‘‘आज इस गोत्र में उत्पन्न (मृतक के गोत्र का नाम बोले) मृतक प्राणी का नाम और नाम के साथ ”प्रेत“ शब्द अवश्य जोड़े। मैं आपको तिल से जल की यह अजंलियाँ दे रहा हूँ। आप इन्हेें ग्रहण करें-

यदि मृतक पुरूष हो तो यह संकल्प करें:-

अद्य अमुक (गोत्र का नाम) गोत्रस्यः अमुक (मृतक का नाम) प्रेतस्यः प्रेतत्व निवारणाय एष तिल यव जलअजंलिः ते मया दीयते तव-उपतिष्ठताम्। यथा संख्या तिल जल अंजलयः तुभ्यं मया दीयन्ते ।’’

यदि मृतक स्त्री हो तो यह संकल्प करें:-

अद्य अमुक1(गोत्र का नाम) गोत्रायाः, अमुक(मृतिका का नाम)प्रेतायाः प्रेतत्व निवारणाय एष तिल यव जल अंजलिः ते मया दीयते तव-उपतिष्ठताम्। यथा संख्या तिल जल अंजलयः तुभ्यं मया दीयन्ते ।’’
स्वर्गस्थ आत्मा की तृप्ति के लिए तिलांजलि दी जाती है। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पंच महाभूतों से बना स्थूल शरीर अपने किए हुए कर्मों के अनुसार पंचतत्वों में जाकर मिल गया।

केवल सूक्ष्म शरीर ही शेश रहा। उस सूक्ष्म शरीर में भावना की प्रधानता ही रहती है। उत्कृश्ट भावनाओं से उत्पन्न अन्तःकरण का वातावरण ही शान्तिदायक है। सूक्ष्म शरीर शुभ कर्मो और भावनाओं से उत्पन सुगन्ध को ग्रहण करके तृप्ति का अनुभव करता है।

पितरों के लिए तिल प्रिय है जैसे कि – तिलोऽसि सोमदैवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्न मद्भिः  स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा।।

त्रेता युग में भगवान श्रीराम जी के समय में मनुष्य तो तिलांजलि देते ही थे परन्तु पक्षी भी तिलाञजलि देते थे। पक्षीराज जटायु की मृत्यु के पश्चात् उसके भाई सम्पाती ने तिलाञजलि दी थी । गोस्वामी तुलसी दास कृत श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में तिलांजलि के विषय में लिखा है –

मोहि लै जाहु सिन्धु तट देऊ तिलाजलि ताहि ।। राम ़ चरि ़किष्किंधा काण्ड दोहा ़ 27

यदि पक्षी अपने सम्बन्धियों को तिलांजलि देते हैं तो इन पक्षियों से हमें शिक्षा लेनी चाहिए और अपने सम्बन्धियों के प्रति अवश्य ही तिलांजलि देनी चाहिए।
यदि तिलाञजलि भावना से प्रदान की जाए तो तिलाञजलि का उद्देश्य पूरा होगा। इस विशय पर वेदों में कहा है-
1. स्वधा स्थ तर्पयत मे पितृन्। यजु 2/34
2. उभा पिवतमश्विनोभा नः शर्मं यच्छतम्। यजु 34/28
3. त्वा देवतायामुपोदके……..अप नः शोशुचदघम्। यजु 35/6
पितरों के लिए तिल प्रिय है जैसे कि: तिलोऽसि सोमदैवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्न मद्भिः स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा।।