तिलक

हिन्दु सनातन धर्म संस्कृति में तिलक एक आवश्यक धार्मिक अंग है। ‘‘तिलकं सर्वमंगलमांगल्यं सर्वोपद्रवनाशनम्’’ अर्थात् तिलक सुख सौभाग्य और मंगलदायक तथा सभी उपद्रव दुःख और विघ्नों को नाश करने वाला है। तिलक लगाने से जहां सौभाग्य की वृद्धि होती है, वहीं सौन्दर्य भी बढ़ता है। तिलक धारी व्यक्ति धार्मिक अनुशासन में रहता है, और दुर्व्यसनों से दूर रहता है। तिलक जहां सात्विकता का प्रतीक है, वहीं विजय श्री भी प्रदान करता है। यज्ञो दानं जपो होमो भोजनं पितृ तर्पणम्। सर्वे भवन्ति विफला ।उर्ध्वपुण्डं विना कृृताः।। यज्ञ, जप, दान, आदि सभी प्रकार के देवकार्य और पितृकार्य तिलक लगाने से सफल होते हैं तथा आज्ञाचक्र पर तिलक लगाने से ध्यान एकाग्र होता है।

वैज्ञानिक कारण:- आज्ञाचक्र में पीनियल ग्रन्थि है। तिलक लगाने से आज्ञाचक्र जागृत होता है। धार्मिक एवं शुभ कार्यों में तिलक लगाने से शरीर के सूक्ष्म एवं स्थूल अवयव जागृत होते हैं। हृदय में एक सौ एक नाड़ियां हैं। उनमें से सुशुम्णा नाड़ी हृदय से सीधी मस्तक के मध्य आज्ञाचक्र से सहस्रार चक्र में पहुंचती है।

आध्यात्मिक कारण:- तिलक इश्टदेव का प्रतीक है, इश्टदेव की स्मृति और कृपा सदैव बनी रहे। सद्भावनाओेें व शुभ कामनाओं का प्रभाव बना रहे। तिलक मोक्ष का संकेत है। अलग- अलग सम्प्रदाय एवं पन्थों में अलग- अलग तिलक लगाने का विधान है।

ब्रह्म  स्थान ज्ञान तंतुओं का विचार केन्द्र मस्तक का मध्य भाग है। जब हमें ज्यादा विचार करने की आवश्यकता पड़ती है तो हम मस्तक के मध्य भाग को दबाते (रगड़ते) हैं। अतः हमारे महर्शियों ने ज्ञान के तंतुओं के केन्द्र स्थान में ही तिलक धारण करने का नियम बनाया है।

तिलक के भेद:- तिलक की तिरछी रेखाएं विशेश प्रकार से मनोभावों को जागृत करतीहैं। तिलकरेखाओंद्वाराशोभावर्धक विज्ञान सिद्ध है। तिलक देवस्थान की मिट्टी, भस्म या पवित्र जल से किया जाता है। विशेश पर्व पर कुंकुम, चन्दन, केसर के द्वारा अनामिका, अगुंश्ठ से तिलक लगाया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति के कारण प्रभु श्री राम जी ने दर्शन देकर ‘‘तिलक’’ की पराकाश्ठा का वर्णन किया।

चित्रकूट के घाट पर, भई सन्तन की भीड़। तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक लेत रघुवीर।।

तिलक जहां पुण्य फल देने वाला है, वहीं पापों को नाश करने वालाहैः- चंदनस्यमहत्पुण्यं,पवित्रंपापनाशनं।

तिलक कामनाओं की पूर्ति करता, अर्थ प्राप्ति एवं धर्म पर चलने की प्रेरणा देता है:- तिलकन्ते प्रयच्छन्तु, धर्म कामार्थ सिद्धये।।

ब्रह्माण्डपुराण के अनुसार:- लाल तिलक सौभाग्यदायक, पीला सुख-संपत्ति दायक, सफेद तिलक मोक्ष दायक है।
पद पुराण के अनुसार:- अनामिका अंगुली से तिलक करने पर शान्ति, मध्यमा से आयुवृद्धि, अंगूठे से पुश्टि, तर्जनी से मोक्ष प्राप्ति।
वैश्णवजन:-भारद्वाज संहिता के अनुसार वैश्णवों को ऊपर की ओर तिलक लगाकर मध्य में लक्ष्मी को स्थान देना चाहिए। जैसे मन्दिर बनाकर उसमें देव स्थापना न करें तो वह मन्दिर नहीं होगा। वैसे ही तिलक हरिस्वरूप है। उसमें लक्ष्मी की स्थापना आवश्यक है।
पदपुराण में तिलक को हरिमन्दिर कहा है:-
मध्य छिद्रेण संयुक्तं, तद्धि वै हरिमन्दिरं।
तिलक सार्वभौम विजय दायक:- प्राचीन काल से ही तिलक सार्वभौम विजय प्रदायक है। राज्याभिशेक समारोह का नाम ही ‘‘राज्यतिलक’’ है। युद्ध के समय ‘‘विजयी भव’’ कहकर तिलक लगाते हैं। भैयादूज पर बहिन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर दीर्घायु की कामना करती है।