तिनका तोड़ने का अभिप्राय

हम जिन्हें अपना मानते हैं वास्तव में न हमारे थे, न हम उनके हैं। केवल मात्र यह संसार, रंगमंच है। जिसमें माता,पिता,पति,पत्नी एवं अन्य संबन्धीगण कुछ समय के लिए इस संसार रूपी रंगमंच पर अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं और माया के कारण हम सभी इस संसार को स्थाई रूप में मिला मान लेते हैं। जबकि श्रीमद्भगवतगीता के अनुसारः- न कोई किसी का है,न था, न होगा। श्रीमद्भागवत के अनुसारः-
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिश्येत सोऽस्म्यहम्।।

भगवान कहते हैं कि मैं ही आदि, मध्य, और अन्त में रहता हूँ। मेरी माया के कारण यह संसार अस्थाई होते हुए भी स्थाई प्रतीत होता है। इन्हीं कारणों से जीव इस भौतिक संसार को छोड़ देने पर शव यात्रा में श्मशान तक जो लोग जाते हैं वह तिनका तोड़कर सम्बन्ध विच्छेद रुपी लौकिक नाटक के अन्त होने का सहज ही सन्देश देते हैं।

अन्त्येश्टि संस्कार (अन्तिम संस्कार) के समय जिन-जिन व्यक्तियों ने मृतक की शरीर को स्पर्श किया है, उनका स्पर्श करने से तथा श्मशान के धुएं के कारण हमारा शरीर अपवित्र हो जाता है। उस अपवित्रता को दूर करने के लिए कुशा, दूर्वा व हरा घास के तिनके का स्पर्श किया जाता है,क्योंकि कुशा, दूर्वा व हरा घास परमपवित्र है। उसका स्पर्श करने से अपवित्र शरीर पवित्र हो जाता है। उसके बाद कुशा, दूर्वा व हरा घास के तिनके को तोड़ने की लौकिक परम्परा केवल सूक्ष्म संस्कार मात्र है। दूसरी ओर अब हमारा स्थूल शरीर से सम्बन्ध अलग हो गया है और सूक्ष्म शरीर के साथ सद्गुणांे तथा सत्कर्मो के प्रति कृतज्ञता एवं सम्मान की भावना का स्मरण बना रहेगा ।

कुशा, दूर्वा व हरे घास का तिनका इस मन्त्र से तोड़ें-

गतोऽसि दिव्यलोकांस्त्वं कर्मणा प्राप्त सत्पथः। मनसा वायुरूपेण कुशे त्वां विनियोजये।।
या
यते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं नहतस्या वधावति। मा तद् भूम्यामाश्रिशन्मा तृणेशु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो –
रातमस्तु।। यजु 35/34