तर्पण

तर्पण वह क्रिया है जिसके द्वारा हम देवताओं, ऋषियों, पितरों को तृप्त करते हैं। जीव जब मनुष्य योनि में जन्म लेता है, तो वह देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, इन तीन प्रकार के ऋणों से बन्ध जाता है। मनुष्य के जीवन और जीवन यापन में देवताओं, ऋषियों और पितरांे का अनिवार्य योगदान होता है। अतएव ब्रह्म , विष्णु, इन्द्र आदि देवता, कपिल, आसुरी आदि ऋषि अतः पिता, दादा, माता, दादी, नानी आदि के अभाव में जन्म और जीवन यापन की कल्पना नहीं की जा सकती है। तर्पण को ब्रह्म यज्ञ कहते हैं: भारद्वाज गृहा सूत्र 3-9-11

देवतर्पण: पूर्व की और मुख करके सव्य होकर देवताओं के लिए तर्पण दाएं हाथ के देव तीर्थ से जल देना चाहिए। वोधायन धर्मसूत्र 2/5

ऋषि तर्पण:- पूर्व की ओर मुख करके सव्य होकर ऋषियों के लिए जल दाएं हाथ के देवतीर्थ से जल देना चाहिए । हिरण्यकेशि गृहा सूत्र 2-19-20

दिव्य मानव तर्पण- उत्तर की ओर मुख करके जनेऊ को कण्ठी कर कायतीर्थ से जल देना चाहीए ।

दिव्य पितृ तर्पणः-दक्षिण की ओर मुख करके जनेऊ अपसव्य करके पितृ तीर्थ से जल देना चाहिए।आश्वलायन गृहासूत्र3-4-5

यम तर्पणः-दक्षिण की ओर मुख करके जनेऊ अपसव्य करके जल की तीन-तीन अंजलि देना चाहिए। मदनपारिजात-296

मानव पितृ तर्पण- दक्षिण की ओर मुख करके जनेऊ अपसव्य करके जल की तीन-तीन अंजलि देना चाहिए।

देवताओं को एक-एक जल अंजलि । ऋषियों को दो-दो जल अंजलि पितरों को तीन-तीन जल अंजलि स्मृति चन्द्रिका 1-191

भीगे हुए वस्त्रों के साथ यदि जल में तर्पण किया जाए तो धारा रूप में ही जल देना चाहिए। जल से बाहर तर्पण करना हो तो सोने, चाँदी, ताँबे या कांसे के बर्तन में जल देना चाहिए। गृहस्थरत्नाकर। 263