चन्द्र ग्रहण

जब पूर्णमासी को सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है अर्थात् सूर्य, चन्द्रमा पृथ्वी तीनों एक सीधी रेखा में होते है और चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में होकर गुजरता है। पृथ्वी की छाया का अधिष्ठाता राहु जब चन्द्रमा को ढक लेता है तो उस समय चन्द्र गहण लगता है। हमारे वैज्ञानिक ऋषियों ने सौरमण्डल में ग्रहों कि गति (चाल) उदय-अस्त वक्री-मार्गी एक राशी से दूसरी राशी में ग्रहों का जाना, सूर्य, चन्द्रमा, तारों का उदय-अस्त और ग्रहण काल का निर्णय देना हमारे ऋषियों की अद्भुत देन है। आज के इस भौतिक युग में ऐसा कोई वैज्ञानिक नहीं है जो आने वाले समय में सौरमण्डल में ग्रहों की स्थिति का अनुमान लगा सके।

सूर्य सि़द्धान्त के अनुसार:- भानोर्भार्थे महीच्छाया तत्तुल्येऽर्कसमयेऽपि वा ।

अर्थात् पूर्णमासी को सूर्य और चन्द्रमा दोनों के अंश कला, विकला पृथ्वी के समान होते हैं तथा जिस पूर्णमासी को चन्द्रमा सूर्य से सातवीं राशि पर हो और अंश, कला, विकला पृथ्वी के समान हो और चन्द्रमा के राहु तथा केतु के समान अंश (बिन्दु) हो तो चन्द्र ग्रहण होता है।

पूर्ण चन्द्र ग्रहणः- चन्द्रमा के अंश जब राहु तथा केतु के अंशों के समान हो तो पूर्ण चन्द्र ग्रहण होता है। यह ग्रहण लगभग 4 घण्टे का होता है और लगभग 2 घण्टे चन्द्र मण्डल चारों ओर से काला नजर आता है।

अर्ध चन्द्र ग्रहणः- चन्द्रमा के अंशों के आस-पास जब राहु वा केतु के अंश हो तो अर्ध चन्द्र ग्रहण होता है।

आंशिक चन्द्र ग्रहणः- आंशिक चन्द्र ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है। उस समय चन्द्रमा का प्रकाश धुधंला हो जाता है।

सूतकः- चन्द्र ग्रहण का सूतक ग्रहण लगने से 9 घण्टे पहले लग जाता है। इसलिए कुशा सूतक से पहले डालें।

स्नानः- चन्द्र ग्रहण के स्नान का मुख्य फल वाराणसी में है। इसके अतिरिक्त अन्य नदियों, तालाब, सरोवर, तीर्थो आदि में भी स्नान का फल मिलता है।

क्या नहीं करना चाहिएः-चन्द्र ग्रहण के सूतक मेंशयन करना, जलपीना, भोजन बनाना, भोजनकरना,मूर्तिस्पर्श करना, नाखुन काटना, गर्भवती महिलाएं चाकू छूरी से कुछ भी ना काटे, व्यसन ना करें, अपराध ना करें, झूठ ना बोलें। इस समय किए गए बुरे कार्यो का प्रभाव कई गुणा बढ़ जाता है।

क्या करना चाहिएः- जप-अनुष्ठान,हवन,स्नान,संकीर्तन आदि करें। ग्रहण के बाद घी और खीर से हवन करें इससे सुख शान्ति प्राप्त होती है।

विशेष :- गर्भवती महिलाओं को ग्रहण में बाहर नहीं निकलना चाहिए। गर्भ में पल रहे शिशु पर राहु और केतु का बुरा प्रभाव पड़ता है।

दानः- ग्रहण के पश्चात् जन्म राशि, जन्म नक्षत्र, जन्म लग्न, अनिष्ट ग्रहों को शान्त करने के लिए यथाशक्ति चांदी, घी, तिल और धन का दान करें।

दोनों ग्रहणों में स्नानादि के नियमः- चन्द्र-सूर्य दोनों राहु से ग्रस्त हुए अस्त हो जाएं तो पुनः उनका दर्शन करके स्नान और भोजन करना चाहिए। भोजन अपने घर का करें। ग्रस्तास्त में दिन-रात- दोनों में भोजन निशिद्ध है। चन्द्रमा राहु ग्रस्त उदित होते हों तो प्रथम दिन भोजन न करें।

चन्द्रमा के प्रातः काल ग्रस्तास्त हो जाने पर मध्म रात्रि तथा अगले दिन का भोजन निषिद्ध है; किन्तु स्नान-हवन आदि मोक्ष-समय से किया जा सकता है। ग्रहण के एक प्रहर पहले बालक, वृद्ध और रोगी भी भोजन न करे। बेध या ग्रहण काल में पक्वान्न भी नहीं खाना चाहिए। ग्रहण में सभी वर्णों को सूतक लगता है:- ‘सर्वेषामेव वर्णानां सूतकं राहुदर्षने।’ दूध-दही, घी से पका हुआ अन्न और मणि में रखा जल, तिल या कुश डालने पर अपवित्र नहीं होते। गंगाजल अपवित्र नहीं होता। जैमिनी पुत्रवान् को रविवार और सन्क्रांित के सिवा ग्रहण में भी उपवास वर्जित करते हैं। हाँ, सबके लिये जप आदि का विधान और शयन आदि का निषेध अवश्य है।