कुम्भ महापर्व

कुम्भ महापर्व की परम्परा भारत में सनातन काल से चली आ रही है। यह महा पर्व भारत की प्राचीन गौरवमयी वैदिक संस्कृति एवं सभ्यता का प्रतीक है।
वेदों के अनुसार:- ऋग्वेद के दसवें मण्डल में कुम्भ पर्व के समय आकाश से दिव्य तरंगों तथा विशिश्ट भू भाग व उस में दिव्य जल का अनेक सूत्र मन्त्रों में वर्णन है। कुम्भ पर्व मनुश्य के संचित मानसिक एवं शारीरिक पापों को नश्ट करता है। अथर्ववेद में 4 कुम्भों के विशय में इस प्रकार से लिखा है:- चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि, क्षीरेण पूर्णा उदकेन दध्ना।। 4-34-7।। अथर्ववेद में कुम्भ के पवित्र काल व फल का वर्णन है । उस समय भूमण्डल वैकुण्ठ के समान पवित्र हो जाता है:- पूर्णः कुम्भोऽधि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। 19-53-3

सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति ग्रहों के योग मंे गंगा (हरिद्वार) प्रयागराज (इलाहाबाद), शिप्रा नदी (उज्जैन), गोदावरी नदी (नासिक) इन चार स्थानों में प्रत्येक 12-12 वर्श के बाद कुम्भ महापर्व होता है।

एक समय देवताओं और असुरों ने इस अमृत कुम्भ को प्राप्त करने के लिए क्षीर सागर में समुद्र मन्थन किया था। अन्त में महाविश्णु धन्वंतरी हाथों में शोभायमान अमृत से पूरित कुम्भ (कलश) उत्पन्न हुए। इस मन्थन से विश उत्पन्न हुआ, उसे भगवान शंकर ने पी लिया था। वह अमृत कुम्भ देवराज इन्द्र को प्रदान किया। देवताओं के कहने पर इन्द्र के पुत्र जयन्त अमृत के कुम्भ को लेकर जब भागने लगे तो राक्षस गण उस के पीछे भागे। अमृत कुम्भ को प्राप्त करने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच बारह वर्शों तक भयंकर युद्ध हुआ । अमृत कुम्भ की रक्षा करते समय कुम्भ को पृथ्वी पर चार बार रखना पड़ा। कुम्भ की चार स्थानों पर अमृत की बून्दें गिरी थी, वे पवित्र स्थान हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक हैं। यहां पर कुम्भ महापर्व12-12 वर्श बाद चार कुम्भ पर्वों का योग बनता है। भगवान विश्णु ने मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत पिला दिया और देवता अमर हो गये।

जीवन को सार्थक बनाने का महापर्व:- कुम्भ महापर्व मंे स्नान, ध्यान, साधना, जप-तप, यज्ञ, सत्संग संकीर्तन, का श्रवण करके जीवन को सार्थक बनाया जाता है तथा आत्मा शुद्धि और आत्म कल्याण होता है।

अर्द्ध कुम्भी का आयोजन 6-6 वर्शों के बाद हरिद्वार और प्रयाग राज में ही होता है। अथर्ववेद में अर्ध-कुम्भी की पवित्रता पर लिखा है:- ऋचा कुम्भी मध्यन्गा श्रयाम्या सिन्चोदकमव नम्।9/5/5।।

ज्योतिशीय दृश्टिः- सभी पर्वोंं की भान्ति कुम्भ पर्व ग्रहों, राशियों, नक्षत्रों, तिथियों, मास एवं पक्ष से सम्बन्धित है। बृहस्पति एक से दूसरी राशि में 11वर्श, 11महीने, 27 दिन का समय लेता है। इसी कारण 12 वर्श बाद कुम्भ पर्व आता है।

वैज्ञानिक दृश्टिकोण:- संसार जीवन वर्दक और जीवनसंहारक दो तत्वों से युक्त है जैसे ऑक्सीजन जीवनवर्दक है तो कार्बन डाईआक्साईड जीवन संहारक है। इन दोनों तत्वों का संघर्श वैज्ञानिक देवताओं और राक्षसों का युद्ध है।

1. सूर्य, चन्द्रमा जीवनववर्दक है।
2. बृहस्पति जीवनवर्दक का मुख्य केन्द्र है।
3. सूर्य केवल एक ही सिंह राशि का स्वामी हैं।
4. चन्द्रमा केवल एक ही कर्क राशि का स्वामी हैं।

इस अवस्था में जब बृहस्पति मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर, कुम्भ आदि मारक ग्रहों की राशि में प्रवेश होने पर तो वह जीवन के संहार को रोक देते हैं, और जीवनवर्धक तन्वो का बल बढ़ जाता है। पृथ्वी के जिस स्थान पर उसके शुभ प्रभाव की मात्रा बढ़ती है, उस क्षेत्र की भूमि, जल तथा आकाश का वातावरण अमृत कणों से प्रवाहित होता है। यह कुम्भ का वैज्ञानिक आधार है।