कपाल क्रिया

कपाल में गुप्त रुप से दशम द्वार है। मनुष्य के शरीर में प्रत्यक्ष रुप से नौ छिद्र विद्यमान हैं। दशम द्वार अर्थात् ब्रह्म स्थान सद्गति के रहस्यों से व्याप्त है। प्राणों का प्रयाण यदि दशम द्वार से हो तो मोक्ष प्राप्ति होतीहै। यजुर्वेद में कहा हैः-भस्मांतंशरीरम्। यजु40/15 सारोद्धार में कपाल क्रिया का विधान है- अर्ध दग्धेऽथवा पूर्णे स्फोटयेत् तस्य मस्तकम् -10/56

मृतक शरीर के आधे जल जाने पर वांस के डंडे से कपाल के स्थान को तीन बार स्पर्श करने की क्रिया को कपाल क्रिया कहते है। खोपड़ी की हड्डी का मध्य भाग तालु सबसे कोमल होता है। जो सब से पहले जल कर खुल जाता है। उस समय वाँस की लकड़ी से स्पर्श करते हुए पूर्णाहुति के रुप में नारियल का गोला रखा जाता है। कपाल क्रिया इस पंचमहाभूत शरीर की पूर्णाहुति का अंग है। दूसरी ओर पुत्र के पिता के प्रति संस्मरणीय वात्सल्य भाव और मरणोपरान्त पुत्र के द्वारा भविष्य में करने वाले कर्तव्यों का प्रतीक है। तीन बार कपाल को स्पर्श करने का अभिप्राय है कि वह समस्त बन्धु-बान्धवों के सामने तीन बार प्रतिज्ञा व संकल्प लेते है कि मैं आपकी मुक्ति के लिए शास्त्र के अनुसार सभी और्ध्वदैहिक क्रिया अर्थात् मृत्यु के पश्चात् सद्गति के लिए किए जाने वाले सभी क्रिया कर्म पूरा करुँगा।

धार्मिक रुप से ब्रह्म स्थान में स्थित जीवन संचालक विचार तन्त्रिका को वाँस की लकड़ी जिसमें बिजली की क्रिया विद्यमान रहती है: जैसे वाँस के विशाल जंगलों में तेज हवाओं से वाँसों के परस्पर घर्षण (रगड़नेे) से अग्नि उत्पन्न होती है। वाँस से कपाल को तीन बार स्पर्श करने का अभिप्राय है कि जीवन संचालन विचार तन्त्रिका को विश्व चेतना में मिला दिया है। और्ध्वदैहिक कर्म करने का अनन्त कोटि फल है- पितरं पुत्रो यदि कर्म प्रदापयेत् अश्वमेघशतादपि फलं प्राप्नोति।

मस्तिष्क जीवन का मूल केन्द्र है। कपाल क्रिया प्रतीक रुप से जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति है और मस्तिष्क रुपी नारियल इस जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति का फल है।

धरणीधर काव्यतीर्य के अनुसार:- शरीर के आधे जल जाने पर कपाल-क्रिया की जाती है। घी के वर्तन को बांस से बांधकर उसमें तिल, जौ, नारियल की गिरी डालकर पुत्र द्वारा यह आहुति डाली जाती है अर्थात् कपाल वेधन किया जाता है। दाह कर्म में जाने वाले इस समय स्थान परिवर्तन करते हैं।

कपाल-क्रिया पर कहा है- अर्ध दग्धेऽथवा पूर्णे स्फोटयेत् तस्य मस्तकम्। गृहस्थानां तु काष्ठेन यतीनां श्रीफलेन च।

गृहस्थी प्राणी की कपाल क्रिया वाँस की लकड़ी से तथा अन्यों की श्रीफल अर्थात् नारियल से करनी चाहिए।

कपाल क्रिया के मन्त्र-
मस्तिष्कमस्य यतमो ललाटं ककाटिकां प्रथमो यः कपालम्।
चित्वा चित्यं हन्वोः पुरूषस्य दिवं रूरोह कतमः स देवः।। 10/2/8।।
2 पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
शान्तिः शान्तिः शान्तिः।