उपनिषद

 

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूलाधार व आध्यात्मिक दर्शन के स्त्रोत हैं। यह ब्रह्मविद्य है। चिंतनशील ऋशियों की ज्ञानचर्चाओं का सार है ।
कवि-हृदय ऋशियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएं है ।

परमशक्ति को शब्दों में बांधने की कोशिशें और उस निराकार,निर्विकार,असीम, अपार को अंतर्दृष्टि से समझने और परिभाशित करने का विवरण है।
उपनिशद् में ऋशि और शिष्यों के बीच बहुत सुन्दर और गूढ संवाद है, जो वेद पढ़ने वाले को रहस्यों तक पंहुचाता है। 108 उपनिशदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता हैः-

1. ऋग्वेदीय – 20 उपनिषद
2. शुक्ल यजुर्वेदीय – 12 उपनिषद
3. कृश्ण यजुर्वेदीय – 32 उपनिषद
4. सामवेदीय – 6 उपनिषद
5. अथर्ववेदीय – 28 उपनिषद
कुल – 108 उपनिशद

मुख्यतः 11 ईशावस्योपनिशद् है। उपनिशदों में सभी 108 उपनिशदों का बीजरूप समाहित है। मुख्य उपनिशद् 11 माने जाते है,जिनके नामइसप्रकारहैः-
1. ईशावास्योपनिषद्     2. केनोपनिशद्
3. कठोपनिशद्        4. प्रश्नोपनिशद्
5.मुण्डकोपनिशद्     6. ऐतरेयोपनिशद्
7.तैत्तरीयोपनिशद्    8. श्वेताश्वतरोपनिशद्
9. बृहदारण्यकोपनिशद 10. छन्दोग्योपनिशद्

आदि शंकराचार्य ने इनमें से 10 उपनिशदों पर टीका लिखी थी । इनमें मांडूक्योपनिशद् सबसे छोटा है (12 श्लोक) और बृहदारण्यकोपनिशद् सबसे बड़ा है । संभवतः ईशावास्योपनिशद् सबसे पुराना है,क्योंकि यह यजुर्वेद का ही अंतिम अध्याय है । इनको मुख्य मानने का कारण ऋशिकृत और प्राचीनतम है। बाद में कई उपनिशद् लिखे गए जो उतने मान्य नहीं है।