आद्य शंकराचार्य

आद्य श्ंाकराचार्य जी का जन्म 788 ई पू केरल में हुआ। उन्होने अपने गुरु गोविन्द पाद से ज्ञान लेकर सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। 6 वर्ष की आयु में वे धर्मशास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित बन गए। उन्होने सनातन हिन्दु धर्म को दार्शनिक आधार पर सुदृढ़ किया। भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक विकास में आद्यशंकराचार्य जी का विशेष योगदान रहा।

उन्होने वाराणसी से बद्रीकाश्रम तक धार्मिक यात्रा की उसके प्श्चात सम्पूर्ण भारत में वेदान्त का प्रचार किया। प्रकाण्ड परम विद्वान आचार्य मण्डन मिश्र के साथ दरभंगा में शास्त्रार्थ किया।

आदि शंकराचार्य जी के अनुसार कर्म और उपासना से बुद्धि शुद्ध होकर ज्ञान के योग्य होती है।

शंकराचार्य जी का जब प्रादुर्भाव हुआ तो उस समय भारतवर्ष में धार्मिक, सामाजिक, संास्कृतिक एवं राजनैतिक परिस्थितियां अतिविकट थी। सनातन धर्म का विभिन्न मार्ग, पन्थ, उपपंथ और उपासना पद्धति के कारण सार्वभौमिक विश्वहितकारी रूप छिन्न-भिन्न हो रहा था।

शंकराचार्य जी साक्षात् भगवान शंकर जी के अवतार हैं। उन्होने 16 वर्ष की अल्पायु में ही सनातन धर्म का पुनर्गठन किया और 200 से अधिक धार्मिक पुस्तकों की रचना की।

कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर जी ने आद्यशंकराचार्य जी को नीलमणि से युक्त 5 शिवलिंग दिए। उन्होने सनातन धर्म की रक्षा के लिए भारत की 4 दिशाओं में 4 पीठों की स्थापना की और 4 शिवलिंगों को 4 पीठों के प्रथम 4 शंकराचार्यों को दिए। पांचवा शिवलिंग नेपाल के पशुपति नाथ मन्दिर में स्थापित किया। राष्टं की एकता और सनातन धर्म की व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए तथा राजनैतिक सत्ता पर धर्मसत्ता का नियंत्रण करने के लिए 4 धर्म केन्द्रों (चार पीठों) की स्थापना की।

प्रथम पीठ:- गोवर्धन पीठ पूर्व में जगन्नाथपुरी उड़ीसा में स्थित है। इस पीठ का सम्बन्ध ऋग्वेद से है और इसका महावाक्य ‘‘ प्रज्ञानं ब्रह्म ’’ है। इस पीठ में सती माता का अंग गिरने के कारण गोवर्धनपीठ को शक्तिपीठ भी कहा जाता है और यहां गोवर्धननाथ और अर्धनारीश्वर आज भी विद्यमान है।

द्वितीय पीठ:- शारदा पीठ पश्चिम दिशा द्वारिकापुरी गुजरात में स्थित है। इस पीठ का सम्बन्ध सामवेद से है और इसका महावाक्य ‘‘ तत्वमसि ’’ है। इस पीठ का देवता श्री सिद्धेश्वर, देवी श्री भद्रकाली हैं।

तृतीय पीठ:- ज्योतिर्मठ उत्तर दिशा बदंीकाश्रम उत्तराँचल में स्थित है। इस पीठ का सम्बन्ध अथर्ववेद से है और इसका महावाक्य  ‘‘ अयं आत्मा ब्रह्म ’’ है। इस पीठ का देवता श्री नारायण, देवी श्री पूर्णागिरी हैं।

चतुर्थ पीठ:- श्रृंगेरी पीठ दक्षिण दिशा कर्नाटक में स्थित है। इस पीठ का सम्बन्ध यजुर्वेद से है। इसका महावाक्य ‘‘अहं ब्रह्मस्मि’’ है। इस पीठ का देवता श्री रामेश्वर, देवी श्री कामाक्षी हैं।